गुजरे हुए साल का हिसाब
दोस्तों आजजो कविता आपके लिए
पोस्ट कर रहा हूँ। यह
कविता काल्पनिक है लेकिन
पढ़ कर ऐसा लगेगा जैसे आपके
साथ में हकीक़त में ऐसा हुआ
है। यह कविता मैंने 2
जनवरी 2013
को लिखी थी। मुझे उम्मीद
है आपको यह कविता पसंद
आएगी।
-: गुजरे हुए साल
का हिसाब :-
नए साल की पहली रात
को ख़ुदा मेरे सपनों में आये !
ख़ुदा ने कहा -kundan,
तुम्हारा पूरा साल
कैसा गुजरा !
और कैसे
गुजरीं तुम्हारी हसीं रातें !!
मैंने कहा - ख़ुदा तुम से
छुपा तो कुछ भी नहीं !
तुम खुदा हो, तुम भगवान
हो !!
तुम ही तो हो सब कुछ करने
वाले !!!
खुदा ने कहा - हाँ मैं
ही खुदा हूँ, मैं ही भगवान
हूँ !
लेकिन कुछ तो लिख कर
सुनाओ अपने प्यार के बारे
में !!
प्यार शब्द सुनते
ही मेरी आँखों से आँसू आ गये !
और सोचने लगा,
आज
तो ख़ुदा भी सुलगती चिंगारी में
आग लगाने आया है !!
कैसे गुजरे दिन, कैसे
गुजरी रातें !
मेरे ख़ुदा सुनो मेरे गुजरे साल
का हिसाब !!
समझ नहीं आता ख़ुदा उन
रातों को क्या लिखूँ ?
लेकिन मैं सोचता हूँ, जो मुझे
याद है वो ही लिखूँ !!
जनवरी की इक रात उससे
हुयी वो पहली मुलाक़ात
याद है !
फरवरी की इक रात उससे
प्यार का इज़हार
करना याद है !!
मार्च की रातों में
उसका वो हाथों में हाथ
डाले सुनी सड़कों पर
घूमना याद है !
अप्रैल की रातों में किये थे
उसने जो वादे, वो वादे मुझे
याद है !!
मई की रातों में
उसका "किस" करने
का अंदाज़ याद है !
जून की रातों में उसका चुपके
- चुपके मिलना याद है !!
जुलाई की रातों में
उसका बेवजह रूठना और
मेरा उसको मनाना याद
है !
अगस्त की जमकर
बरसती रातों में
उसका मेरा दिल
तोडना याद है !!
सितम्बर की रातों में
दोस्तों से अपना गम
छुपाना याद है !
अक्टूबर की रातों में
मेरी आँखों से बहते आसूँ याद
याद !!
नवम्बर की रातों में केवल
उसी के सपने आना याद है !
दिसम्बर की रातों में मुझे
मेरी तनहाइयाँ याद है !!
तू ही बता ख़ुदा अब इस से
ज्यादा प्यार और दर्द
क्या होगा !
तू ही बता खुदा मुझे इससे
ज्यादा याद क्या होगा !!
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