Tuesday, 26 February 2013

ये जिन्दगी....

सब कुछ मिला इस जिन्दगी से
पर मिली न मुझको जिन्दगी,

भूल गये आज वो हीं हमें
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,

अब हार गया मेरा अंतर्मन
सूना सूना लग रहा है गगन,
अब बची है बस उनकी बन्दगी
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,

तड़पता रहूँ या फिर मर जाऊ
जिनी तो है अपनी  जिन्दगी,
अपने लिए न सही उनके लिए
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,

चूर हुए सरे सपने उनके
फिर किस काम की ये जिन्दगी,
करूँ बार बार उनका नमन
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,

इरादा नहीं बतलाने का ये
मुझपे क्या है अब बीत रही,
उनका तो एहसान है मुझपर
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,
 
कितने अच्छे थे वो दिन
जब खेल रही थी ये जिन्दगी,
हुई खता और वो रूठ गये
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,

हर बात पर अब ठोकर लगती है
जिन्दगी खुद की जोकर लगती है,
कैसे क़र्ज़ अदा करू मैं अब उनका
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,

इक बार हस दे वो मेरी बातों पर
फिर खिल जाएगी ये जिन्दगी,
मैं तो माटी भर उनके चरणों का
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,

साँस आ रही है और जा रही है
पर घुट रही है ये जिन्दगी ,
उनकी जगह भगवान से ऊपर
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,

हर पल आएँगी बेदर्द आंधियाँ 
पर लड़ जाएगी ये जिन्दगी,
बस आशीस काफी उन अपनों का
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,

Kundan Mishra
Saharsa,Bihar



http://www.madhepuratoday.com/2013/02/blog-post_25.html

माँ....../// कुन्दन मिश्रा

 
तू दूर है मुझसे पर पास लगती है
जीने की मेरी एक आश लगती है,
इक तू हीं धरम इक तू हीं करम
माँ! तू मुझको मेरी एहसास लगती है,
अब जब भी बचपन में खोता हूँ
जी भरकर मैं रोता हूँ,
तू ऊँगली थामकर चल रही
यहीं कहीं आसपास सी लगती है
माँ! तू मुझको मेरी एहसास लगती है,
बहुत दिन हो गये तेरे नाक को छुए
कांधे पर सर रखकर भी सोये,
अब जब जब प्यास सी लगती है
माँ! तू मुझको मेरी एहसास लगती है,
मुझको अब ये क्यूँ लग रहा जैसे
तू भी मुझसे ये कहती है,
जब जब तेरी यादों में खोती हूँ
मैं भी जीभरकर रोती हूँ,
तू दूर है मुझसे कोई बात नहीं
मैं हरपल तेरे साथ होती हूँ,
माँ! फैला दे तू अपना आंचल
सर रखकर मैं सो जाता हूँ,
एक अच्छा सा कोई गीत सुना दे
फिर सपनों में खो जाता हूँ,
अब मेरी तो एक ही है दुआ
की जब जब मेरा जीवन हो,
हाथों में तेरी ही ऊँगली
और तेरे घर का ही आँगन हो ,
कुन्दन मिश्रा, संत नगर, सहरसा