वोह जमाना कुछ और था..
तेरा मेरा रिश्ता पुराना कुछ और था..
होमेवोर्क के बहाने ,
तुझसे मिलने का बहाना कुछ और था.
रिसेस में पराठो का चुपके से खिलाना
वोह मासूम याराना कुछ और था..
प्यार में दोस्ती. दोस्ती में प्यार..
लब्जो का वोह तराना कुछ और था..
एक अरसे बाद निकला था तेरी गली से
जो रोशन हुआ करती थी तेरी हसी से
कदम बस ठहर से गये
साँसे दो पल को जैसे थम सी गयी
फिर दिल को ये गुमान आया
वोह किस्सा पुराना कुछ और था
तेरा मेरा रिश्ता पुराना कुछ और था
वोह जमाना कुछ और था..वोह जमाना कुछ और था..
यूँ हीं गुमनाम रहूँगा मैं....
बिखरे हुए सुरों को समेटकर एक नया साज़ लिख जाऊँगा...... गूंजती रहेगी सदियों तक फिजाओं मैं एक रोज वो आवाज़ लिख जाऊँगा...... लिखता हूँ गीत मुहब्बत के मगर करता हूँ ये वादा... लहू की हर एक बूंद से एक दिन इन्कलाब लिख जाऊँगा.....
Sunday, 4 August 2013
Sunday, 10 March 2013
कसमकस
जब तमन्नाओं में मेरे पंख
लगा
उड़ चला खुली आकाश में,
मन में उमंग और थोडा सा डर
क्या होगा सूरज के तेज
प्रकाश में,
गर लौटता तो इरादा छुट जाता
चलता तो जीवन छुट जाता,
जिन्दगी फसी एक कसमकस में
तेज हुई जलन सूरज के तेज
प्रकाश में,
पीछे लौटना मेरी हसरत नहीं
इसलिए आगे बढ़ा इस आभास
में,
होगी अब मंजिल ज्यादा दूर
नहीं
छुटेगी नहीं साँस सूरज के
तेज प्रकाश में,
जलता रहा फिर भी चलता रहा
आशाओं के नव आकाश में,
मुझे इसका आभाष कहाँ की
मंजिल मेरी थी सूरज के उस मंद
प्रकाश में,
जल गया और फिर मैं रख हुआ
पर अब ये दिल मान गया,
लालच बुरी बला है
ज्यादा पाने से अच्छा तो कुछ पाने में ही भला है,
Saturday, 2 March 2013
गुजरे हुए साल का हिसाब
दोस्तों आजजो कविता आपके लिए
पोस्ट कर रहा हूँ। यह
कविता काल्पनिक है लेकिन
पढ़ कर ऐसा लगेगा जैसे आपके
साथ में हकीक़त में ऐसा हुआ
है। यह कविता मैंने 2
जनवरी 2013
को लिखी थी। मुझे उम्मीद
है आपको यह कविता पसंद
आएगी।
-: गुजरे हुए साल
का हिसाब :-
नए साल की पहली रात
को ख़ुदा मेरे सपनों में आये !
ख़ुदा ने कहा -kundan,
तुम्हारा पूरा साल
कैसा गुजरा !
और कैसे
गुजरीं तुम्हारी हसीं रातें !!
मैंने कहा - ख़ुदा तुम से
छुपा तो कुछ भी नहीं !
तुम खुदा हो, तुम भगवान
हो !!
तुम ही तो हो सब कुछ करने
वाले !!!
खुदा ने कहा - हाँ मैं
ही खुदा हूँ, मैं ही भगवान
हूँ !
लेकिन कुछ तो लिख कर
सुनाओ अपने प्यार के बारे
में !!
प्यार शब्द सुनते
ही मेरी आँखों से आँसू आ गये !
और सोचने लगा,
आज
तो ख़ुदा भी सुलगती चिंगारी में
आग लगाने आया है !!
कैसे गुजरे दिन, कैसे
गुजरी रातें !
मेरे ख़ुदा सुनो मेरे गुजरे साल
का हिसाब !!
समझ नहीं आता ख़ुदा उन
रातों को क्या लिखूँ ?
लेकिन मैं सोचता हूँ, जो मुझे
याद है वो ही लिखूँ !!
जनवरी की इक रात उससे
हुयी वो पहली मुलाक़ात
याद है !
फरवरी की इक रात उससे
प्यार का इज़हार
करना याद है !!
मार्च की रातों में
उसका वो हाथों में हाथ
डाले सुनी सड़कों पर
घूमना याद है !
अप्रैल की रातों में किये थे
उसने जो वादे, वो वादे मुझे
याद है !!
मई की रातों में
उसका "किस" करने
का अंदाज़ याद है !
जून की रातों में उसका चुपके
- चुपके मिलना याद है !!
जुलाई की रातों में
उसका बेवजह रूठना और
मेरा उसको मनाना याद
है !
अगस्त की जमकर
बरसती रातों में
उसका मेरा दिल
तोडना याद है !!
सितम्बर की रातों में
दोस्तों से अपना गम
छुपाना याद है !
अक्टूबर की रातों में
मेरी आँखों से बहते आसूँ याद
याद !!
नवम्बर की रातों में केवल
उसी के सपने आना याद है !
दिसम्बर की रातों में मुझे
मेरी तनहाइयाँ याद है !!
तू ही बता ख़ुदा अब इस से
ज्यादा प्यार और दर्द
क्या होगा !
तू ही बता खुदा मुझे इससे
ज्यादा याद क्या होगा !!
जागो
ऐ मेरी जिन्दगी तू मेरे साथ चल
वक्त नहीं पास में,अब दिन-रात चल,
रूके गर तो फिर पछताना होगा
मंजिल पर जाकर अब सुस्ताना होगा,
आरक्षण की जो यहाँ आग लगी है
भरष्टाचारीयों की भी भूख बढ़ी है,
बेरोजगारी में खुद को अब जलाना होगा
देश के गद्दारों को ये बताना होगा,
जो हमारा है वो क्यों अब हमसे छीन रहे
नोटों के बंडल तो आप पहले से हीं गीन रहे,
सोचो ऐसे में हमारा कैसा जीना होगा
ऊपर तूझको भी अपना हिसाब बताना होगा,
कर्म ऐसा हो फिर चेहरा को छुपाना ना पड़े
पर तुम्हें पल्लू का सहारा लेना होगा,
मत बेच खुद के लिए हमें और हमारे देश को
कभी तूने भी इस देश को अपनी माँ पुकारा होगा,
Tuesday, 26 February 2013
ये जिन्दगी....
सब कुछ मिला इस जिन्दगी से
पर मिली न मुझको जिन्दगी,
पर मिली न मुझको जिन्दगी,
भूल गये आज वो हीं हमें
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,
अब हार
गया मेरा अंतर्मन
सूना
सूना लग रहा है गगन,
अब बची
है बस उनकी बन्दगी
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,
तड़पता रहूँ या फिर मर जाऊ
जिनी तो है अपनी जिन्दगी,
अपने लिए न सही उनके लिए
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,
चूर हुए
सरे सपने उनके
फिर किस काम की ये जिन्दगी,
करूँ बार
बार उनका नमन
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,
इरादा नहीं बतलाने का ये
मुझपे क्या है अब बीत रही,
उनका तो एहसान है मुझपर
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,
कितने अच्छे थे वो दिन
जब खेल
रही थी ये जिन्दगी,
हुई खता
और वो रूठ गये
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,
हर बात पर अब ठोकर लगती है
जिन्दगी खुद की जोकर लगती है,
कैसे क़र्ज़ अदा करू मैं अब उनका
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,
इक बार हस
दे वो मेरी बातों पर
फिर खिल
जाएगी ये जिन्दगी,
मैं तो
माटी भर उनके चरणों का
जिन्होंने
मुझे दी ये जिन्दगी,
साँस आ रही है और जा रही है
पर घुट रही है ये जिन्दगी ,
उनकी जगह भगवान से ऊपर
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,
हर पल
आएँगी बेदर्द आंधियाँ
पर लड़
जाएगी ये जिन्दगी,
बस आशीस
काफी उन अपनों का
जिन्होंने मुझे दी ये जिन्दगी,
Kundan Mishra
Saharsa,Bihar
Saharsa,Bihar
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